शनिवार, 9 जनवरी 2021

दौर –ए- नक़ाब में बेनक़ाब क्या-क्या


दिलों में आग लबों पे गुलाब रखते हैं।

सब अपने चेहरे पे दोहरी नक़ाब रखते हैं।।

यहां सिर्फ व्यक्ति के चरित्र की बात नहीं हो रही है बल्कि इसमें समय, सत्ता और समाज के चरित्र को भी दर्शाया जा रहा है। दौर--नक़ाब यानी कोरोना काल में जब मास्क यानी मुखौटा या नक़ाब पहनना अनिवार्य कर दिया गया है तब लोगों को और सहूलियत हो गयी कि पहले से जो छिपाकर मुखौटे लगे थे उन पर खुलकर एक और मुखौटा लगाने की छूट मिली! इस मुखौटे वाले दौर में बहुत सारी हक़ीक़तें छिपाई गयीं तो बहुत सारे झूठ बेनक़ाब भी हुए। समय की परत चढ़ते जाने से हम बहुत सी बातों को विस्मृत कर देते हैं जोकि भुलाने के काबिल नहीं होती हैं । क्या इस दौर ने हमको जो सिखाया उसे इतनी जल्दी भूल जाना सही होगा? या उन गलतियों को दोबारा न दोहराया जाए इसके लिए भी प्रयास शुरू किए जाने चाहिए । हम इतिहास क्यों पढ़ते हैं? क्या सिर्फ डिग्री के लिए, जिससे जीविकोपार्जन का कोई साधन जुटाया जा सके अथवा सिर्फ ज्ञान के लिए । शायद इससे बढ़कर इतिहास हम इसलिए भी पढ़ते हैं ताकि हम इतिहास में की गई गलतियां दोहराने से बचें भी ।

      साल भर के घटनाक्रमों पर दृष्टिपात करें तो हम पाएंगे कि पूरी दुनिया के दम्भ को एक आंखों से न दिख सकने वाले विषाणु ने एक झटके में चकनाचूर कर दिया। इसके साथ ही हर एक सरकारी महकमें द्वारा किये जाने वाले दावों की भी पोल खोलकर रख दी। खैर, हमें नक़ाब से बात शुरू करनी थी और हम कहाँ भटकने लगे।

 

        वर्ष 2020 की शुरुआत ही नक़ाब के आतंक से होती हैजेएनयू की घटना (5 जनवरी,2020) को कौन भूल सकता है, जहां दर्जनों नकाबपोश लोग हाथ में हथियार लेकर घंटो परिसर के भीतर हिंसा का तांडव करते हैं और बाहर पुलिस और मीडिया मूकदर्शक बनी खड़ी रहती है। हैरानी की बात है कि ये सब हो रहा था देश की राजधानी में । देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में,जहां हमेशा से वैचारिक बहस को बढ़ावा दिया जाता रहा है, हिंसा को कभी स्वीकार नहीं किया गयाजहां असहमतियों का भी खुले दिल से स्वागत किया जाता रहा है दो अलग विचारधाराओं वाले व्यक्ति भी एक साथ एक टेबल पर बैठकर खाना खाते हुए घंटों एक दूसरे को अपने तर्कों से पटखनी देते हैं किंतु कभी भी हिंसा का सहारा नहीं लिया । इनका विश्वास है कि

पढ़े-लिखे हो तो, तलवार रख के बात करो

ज़बाँ वाले ज़बाँ को ज़बाँ से काटते हैं।।

सरकार और मीडिया ने तो इसे दो वैचारिक गुटों का झगड़ा बताकर अपना किनारा कर लिया किंतु नकाबपोश बेनक़ाब होते-होते रह गए..?

      वैसे साल 2020 बहुत से मायनों में बुरा रहा किंतु इस साल जो सबसे अधिक क्षतिग्रस्त हुआ वह था – ‘विश्वास’सबसे पहले धर्म और ईश्वर के प्रति सर्वाधिक सवाल खड़े किए गए, क्योंकि  पहले पहल सभी तरह के धार्मिक स्थलों को बंद किया गया। फिर पूंजीवाद द्वारा जीवन के जो मानक तय कर दिए गए थे,गाड़ी, बंगला, शॉपिंग मॉल, सिनेमाघर इत्यादि दिखावटी जीवन शैलियों को जीवन मूल्य बना दिया गया था, उसे एकाएक पलटकर रख दिया । सारी रंगीन चकाचौंध को सूरज की रोशनी में लाकर खड़ा कर दिया । सामाजिक स्तर पर लोग सामुदायिक कार्यक्रमों से कटकर घरों में कैद होकर रहने के लिए अभिशप्त हुए । लॉकडाउन में तो पूरी दुनिया ही अस्पताल के रूप में तब्दील हो गयी थी, जहां सिर्फ दवा की दुकानें ही खुली दिखीं (बाद में दारू की भी)। राजनैतिक स्तर पर असहमतियों को दबाया गया और लोकतंत्र को क्वारंटाइन कर दिया गया । सरकार ने लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया । कोरोना के बजाय भूख और लाचारी ने ही कितने लोगों की जान ली जो कि अत्यंत चिंताजनक है । मीडिया के प्रति तो पहले से ही अविश्वास कायम था उसको इस दौर की अधिकांश मीडिया ने और पुष्ट कर दिया । तीन महीने तक शेरलॉक होम्स बनकर सुशान्त मर्डर मिस्ट्री को सुलझाने के नाम पर लोगों को तीन माह तक उलझाए रखा।

     इससे इतर एक बड़ा प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि आखिर लोगों को अपने ही देश की मीडिया और सरकार या अपने ही समाज पर भरोसा क्यों नहीं होता? क्या कारण रहा है कि अनपढ़ तो छोड़ो पढ़े-लिखे लोग और नामी हस्तियां भी क्यों कोरोना संक्रमित होने के पश्चात बताने से कतराते रहे , ये विचारणीय प्रश्न है। ये हमारी शिक्षा, सरकार, मीडिया या व्यवस्था का दोष है या कि व्यक्तिगत कमजोरी, जो कि हमें जागरूक करने के बजाय भयाक्रांत करने में अधिक सफल हुए?  केवल व्यवस्था को दोषी बताकर क्या हम निकल सकते हैं? नहीं, कोरोना तो केवल एक चेतावनी थी, समस्याएं तो हमेशा रूप बदलकर देश-दुनिया के सामने आती रहेंगी । लेकिन हम कितने ‘मनुष्य’ बनकर यानी मानवीय रहकर इसका सामना कर पाते हैं, वही हमारी सभ्यता की प्रगति को दर्शायेगा ।

           अंततः व्यक्ति ,दल या सरकार किसी को भी बेहतर परिणाम के लिए अपने विचारों के क्रियान्यवयन से पूर्व इस केन्याई लोकोक्ति को ध्यान में रखना चाहिए कि ‘हमेशा अच्छा नाम छोड़कर जाएं , हो सकता है आप वापस आएं।’

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