बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

नई भर्ती

◆ पद का नाम - 'चाटुकारिताजीवी'

◆ पात्रता -

● कोई भी अपात्र व्यक्ति इस पद के लिए पात्र है, यदि उसके पास निम्न योग्यताएं हैं- 

◆ शैक्षणिक योग्यता-

- इस पद के उम्मीदवारों के लिए कोई भी शैक्षणिक योग्यता निर्धारित नहीं की गई है। क्योंकि चाटुकार संस्था का मानना है कि देश में सर्वोच्च पद के लिए कोई भी शैक्षणिक योग्यता निर्धारित नहीं है। 

- संस्था को आपके संस्कारगत ज्ञान पर पूरा भरोसा है।

- व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी से ज्ञान प्राप्त करने वालों को वरीयता दी जाएगी।

◆ वांछनीय योग्यता -

- किसी का भी चरित्रहनन करने में तनिक भी संकोच न करता हो।

- गाली- गलौच की सामयिक शब्दावली से भलीभाँति परिचित हो, साथ ही फर्राटेदार गाली देने में निपुण हो।

- इसके प्रमाणस्वरूप अपने सोशल मीडिया अकाउंट से कुछ चुनिंदा एवं बेहतरीन 'अभद्र टिप्पणियों' की प्रतिलिपि फॉर्म के साथ संलग्न कर सकते हैं।

- शरीर से बलिष्ठतम होने के साथ ही लाठी, तलवार ,कट्टा आदि अत्याधुनिक हथियारों को चलाने की जानकारी हो।

- उम्मीदवार को ये सुनिश्चित करना होगा कि उनके पुरखों में कोई कभी निजी-हित के अलावा समाज-हित में अपना नुकसान न किया हो।

- बात-बात पर पलट जाने और रंग बदलने का गुण होना चाहिए।

◆ वेतनमान एवं सुविधाएं-

- चाटुकारिताजीवी को इतना वेतन एवं अतिरिक्त खर्च प्रदान किया जाएगा जिससे उनका नशा न उतरने पाए।

- चाटुकारिताजीवी के लिए किसी भी सार्वजनिक संस्था में बैकडोर एंट्री की व्यवस्था रहेगी।

- फ्रंट डोर से एंट्री करते वक़्त सारे बैरिकेड्स हटा दिए जाएंगे।

- देश की हालत कितनी भी खराब क्यों न हो, चाटुकारिताजीवियों की हालत हमेशा दुरुस्त रहेगी।

- सरल शब्दों में, देश की हालत जितनी खराब रहेगी ,चाटुकारिताजीवी की हालत उतनी अच्छी रहेगी।


◆सेवाएं एवं शर्तें -

- चाटुकार संस्था को अन्य सभी संस्थाओं एवं विधानों से ऊपर मानना होगा।

- संस्था द्वारा निर्देशित कार्यों को अंजाम देते वक्त अपने दिमाग का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करना होगा।

- संस्था के नियमों से असहमत व्यक्ति/व्यक्तियों/ संगठन के खिलाफ आभासी दुनिया के विभिन्न मंचों पर बेखौफ दुष्प्रचार करना होगा। ज़रूरत पड़ने पर वास्तविक दुनिया में हथियारों के सहारे असहमति को दबाना होगा।

- समय - समय पर जी हुज़ूर बोलते रहना होगा।

- संस्था के विरोध में उठे स्वरों को दबाने के लिए उनसे ज़्यादा शोरगुल करना होगा।

- चरित्रहनन हेतु समय - समय पर संस्था द्वारा लक्ष्य दिया जाता रहेगा।

* चरित्रहनन करते वक़्त कुछ सावधानियां- 

- लक्षित व्यक्ति यदि स्त्री है तो उसके यौनांगों को लेकर निकृष्टतम शब्दों का प्रयोग करते हुए सार्वजनिक रूप से क्षत-विक्षत करने की धमकी देना।

- लक्षित व्यक्ति यदि पुरुष है तो उसके परिजनों माँ-बहन- बेटी को लेकर अश्लील शब्दों का भरपूर इस्तेमाल करना होगा, जान से मारने की धमकी देनी होगी।

- यदि लक्षित व्यक्ति दलित/आदिवासी/अल्पसंख्यक/बुद्धिजीवी है तो उसके घर जाकर हिंसा करनी होगी। उसे हमेशा के लिए भी चुप कराना पड़ सकता है।

◆ पदों की संख्या-

* 'पहले आओ पहले पाओ' के आधार पर यहां स्थान दिया जाएगा, क्योंकि दुनिया में चाटुकारों की कमी नहीं है।

     अतः जल्दी करें, कहीं देर न हो जाये।।


◆ पद का नाम - 'आंदोलनजीवी'

 ◆ पात्रता- 

  " जो घर फूंके आपना, चले हमारे साथ।"

◆ शैक्षणिक योग्यता- 

 " ढाई आखर की समझ होनी चाहिए।"

( पोथी पढ़ि- पढ़ि जग मुआ...)

◆ वांछनीय योग्यता-

- ज़मीर बेचकर अमीर बनने की ख्वाहिश न रखता हो।

- समाजहित के साथ अपना हित जोड़कर देखने की क्षमता रखता हो।

- बदलाव का स्वागत करने के लिए हमेशा तैयार हो।

- लाभ का पद पाने के लिए नहीं बल्कि लाभ का पद छोड़कर काम करने का हौसला हो।

- स्वाभिमानी हो।

◆ सेवाएं एवं शर्तें- 

" सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।।"

◆ वेतनमान एवं सुविधाएं- 

- आन्दोलनजीवी को कार्यस्थल पर पहुंचने से लेकर वहां रहने,खाने का खर्च स्वयं वहन करना होगा।

-  ज़रूरत पड़ने पर अन्य की भी आर्थिक मदद करनी होगी।

- पुलिस की लाठियां, आंसू गैस, चाटुकारिताजीवियों की गाली-गलौच की सुविधाएं मुफ्त में उपलब्ध होंगी।

- शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक रूप से प्रताड़ित किया जाता रहेगा।

◆ पदों की संख्या -

" हमसफर चाहिए, हुजूम नहीं,

इक मुसाफ़िर ही काफ़िला है मुझे।"


* आवेदक अपने रिस्क पर अप्लाई कर सकते हैं।।

        धन्यवाद..!!

शनिवार, 9 जनवरी 2021

दौर –ए- नक़ाब में बेनक़ाब क्या-क्या


दिलों में आग लबों पे गुलाब रखते हैं।

सब अपने चेहरे पे दोहरी नक़ाब रखते हैं।।

यहां सिर्फ व्यक्ति के चरित्र की बात नहीं हो रही है बल्कि इसमें समय, सत्ता और समाज के चरित्र को भी दर्शाया जा रहा है। दौर--नक़ाब यानी कोरोना काल में जब मास्क यानी मुखौटा या नक़ाब पहनना अनिवार्य कर दिया गया है तब लोगों को और सहूलियत हो गयी कि पहले से जो छिपाकर मुखौटे लगे थे उन पर खुलकर एक और मुखौटा लगाने की छूट मिली! इस मुखौटे वाले दौर में बहुत सारी हक़ीक़तें छिपाई गयीं तो बहुत सारे झूठ बेनक़ाब भी हुए। समय की परत चढ़ते जाने से हम बहुत सी बातों को विस्मृत कर देते हैं जोकि भुलाने के काबिल नहीं होती हैं । क्या इस दौर ने हमको जो सिखाया उसे इतनी जल्दी भूल जाना सही होगा? या उन गलतियों को दोबारा न दोहराया जाए इसके लिए भी प्रयास शुरू किए जाने चाहिए । हम इतिहास क्यों पढ़ते हैं? क्या सिर्फ डिग्री के लिए, जिससे जीविकोपार्जन का कोई साधन जुटाया जा सके अथवा सिर्फ ज्ञान के लिए । शायद इससे बढ़कर इतिहास हम इसलिए भी पढ़ते हैं ताकि हम इतिहास में की गई गलतियां दोहराने से बचें भी ।

      साल भर के घटनाक्रमों पर दृष्टिपात करें तो हम पाएंगे कि पूरी दुनिया के दम्भ को एक आंखों से न दिख सकने वाले विषाणु ने एक झटके में चकनाचूर कर दिया। इसके साथ ही हर एक सरकारी महकमें द्वारा किये जाने वाले दावों की भी पोल खोलकर रख दी। खैर, हमें नक़ाब से बात शुरू करनी थी और हम कहाँ भटकने लगे।

 

        वर्ष 2020 की शुरुआत ही नक़ाब के आतंक से होती हैजेएनयू की घटना (5 जनवरी,2020) को कौन भूल सकता है, जहां दर्जनों नकाबपोश लोग हाथ में हथियार लेकर घंटो परिसर के भीतर हिंसा का तांडव करते हैं और बाहर पुलिस और मीडिया मूकदर्शक बनी खड़ी रहती है। हैरानी की बात है कि ये सब हो रहा था देश की राजधानी में । देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में,जहां हमेशा से वैचारिक बहस को बढ़ावा दिया जाता रहा है, हिंसा को कभी स्वीकार नहीं किया गयाजहां असहमतियों का भी खुले दिल से स्वागत किया जाता रहा है दो अलग विचारधाराओं वाले व्यक्ति भी एक साथ एक टेबल पर बैठकर खाना खाते हुए घंटों एक दूसरे को अपने तर्कों से पटखनी देते हैं किंतु कभी भी हिंसा का सहारा नहीं लिया । इनका विश्वास है कि

पढ़े-लिखे हो तो, तलवार रख के बात करो

ज़बाँ वाले ज़बाँ को ज़बाँ से काटते हैं।।

सरकार और मीडिया ने तो इसे दो वैचारिक गुटों का झगड़ा बताकर अपना किनारा कर लिया किंतु नकाबपोश बेनक़ाब होते-होते रह गए..?

      वैसे साल 2020 बहुत से मायनों में बुरा रहा किंतु इस साल जो सबसे अधिक क्षतिग्रस्त हुआ वह था – ‘विश्वास’सबसे पहले धर्म और ईश्वर के प्रति सर्वाधिक सवाल खड़े किए गए, क्योंकि  पहले पहल सभी तरह के धार्मिक स्थलों को बंद किया गया। फिर पूंजीवाद द्वारा जीवन के जो मानक तय कर दिए गए थे,गाड़ी, बंगला, शॉपिंग मॉल, सिनेमाघर इत्यादि दिखावटी जीवन शैलियों को जीवन मूल्य बना दिया गया था, उसे एकाएक पलटकर रख दिया । सारी रंगीन चकाचौंध को सूरज की रोशनी में लाकर खड़ा कर दिया । सामाजिक स्तर पर लोग सामुदायिक कार्यक्रमों से कटकर घरों में कैद होकर रहने के लिए अभिशप्त हुए । लॉकडाउन में तो पूरी दुनिया ही अस्पताल के रूप में तब्दील हो गयी थी, जहां सिर्फ दवा की दुकानें ही खुली दिखीं (बाद में दारू की भी)। राजनैतिक स्तर पर असहमतियों को दबाया गया और लोकतंत्र को क्वारंटाइन कर दिया गया । सरकार ने लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया । कोरोना के बजाय भूख और लाचारी ने ही कितने लोगों की जान ली जो कि अत्यंत चिंताजनक है । मीडिया के प्रति तो पहले से ही अविश्वास कायम था उसको इस दौर की अधिकांश मीडिया ने और पुष्ट कर दिया । तीन महीने तक शेरलॉक होम्स बनकर सुशान्त मर्डर मिस्ट्री को सुलझाने के नाम पर लोगों को तीन माह तक उलझाए रखा।

     इससे इतर एक बड़ा प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि आखिर लोगों को अपने ही देश की मीडिया और सरकार या अपने ही समाज पर भरोसा क्यों नहीं होता? क्या कारण रहा है कि अनपढ़ तो छोड़ो पढ़े-लिखे लोग और नामी हस्तियां भी क्यों कोरोना संक्रमित होने के पश्चात बताने से कतराते रहे , ये विचारणीय प्रश्न है। ये हमारी शिक्षा, सरकार, मीडिया या व्यवस्था का दोष है या कि व्यक्तिगत कमजोरी, जो कि हमें जागरूक करने के बजाय भयाक्रांत करने में अधिक सफल हुए?  केवल व्यवस्था को दोषी बताकर क्या हम निकल सकते हैं? नहीं, कोरोना तो केवल एक चेतावनी थी, समस्याएं तो हमेशा रूप बदलकर देश-दुनिया के सामने आती रहेंगी । लेकिन हम कितने ‘मनुष्य’ बनकर यानी मानवीय रहकर इसका सामना कर पाते हैं, वही हमारी सभ्यता की प्रगति को दर्शायेगा ।

           अंततः व्यक्ति ,दल या सरकार किसी को भी बेहतर परिणाम के लिए अपने विचारों के क्रियान्यवयन से पूर्व इस केन्याई लोकोक्ति को ध्यान में रखना चाहिए कि ‘हमेशा अच्छा नाम छोड़कर जाएं , हो सकता है आप वापस आएं।’