बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

नई भर्ती

◆ पद का नाम - 'चाटुकारिताजीवी'

◆ पात्रता -

● कोई भी अपात्र व्यक्ति इस पद के लिए पात्र है, यदि उसके पास निम्न योग्यताएं हैं- 

◆ शैक्षणिक योग्यता-

- इस पद के उम्मीदवारों के लिए कोई भी शैक्षणिक योग्यता निर्धारित नहीं की गई है। क्योंकि चाटुकार संस्था का मानना है कि देश में सर्वोच्च पद के लिए कोई भी शैक्षणिक योग्यता निर्धारित नहीं है। 

- संस्था को आपके संस्कारगत ज्ञान पर पूरा भरोसा है।

- व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी से ज्ञान प्राप्त करने वालों को वरीयता दी जाएगी।

◆ वांछनीय योग्यता -

- किसी का भी चरित्रहनन करने में तनिक भी संकोच न करता हो।

- गाली- गलौच की सामयिक शब्दावली से भलीभाँति परिचित हो, साथ ही फर्राटेदार गाली देने में निपुण हो।

- इसके प्रमाणस्वरूप अपने सोशल मीडिया अकाउंट से कुछ चुनिंदा एवं बेहतरीन 'अभद्र टिप्पणियों' की प्रतिलिपि फॉर्म के साथ संलग्न कर सकते हैं।

- शरीर से बलिष्ठतम होने के साथ ही लाठी, तलवार ,कट्टा आदि अत्याधुनिक हथियारों को चलाने की जानकारी हो।

- उम्मीदवार को ये सुनिश्चित करना होगा कि उनके पुरखों में कोई कभी निजी-हित के अलावा समाज-हित में अपना नुकसान न किया हो।

- बात-बात पर पलट जाने और रंग बदलने का गुण होना चाहिए।

◆ वेतनमान एवं सुविधाएं-

- चाटुकारिताजीवी को इतना वेतन एवं अतिरिक्त खर्च प्रदान किया जाएगा जिससे उनका नशा न उतरने पाए।

- चाटुकारिताजीवी के लिए किसी भी सार्वजनिक संस्था में बैकडोर एंट्री की व्यवस्था रहेगी।

- फ्रंट डोर से एंट्री करते वक़्त सारे बैरिकेड्स हटा दिए जाएंगे।

- देश की हालत कितनी भी खराब क्यों न हो, चाटुकारिताजीवियों की हालत हमेशा दुरुस्त रहेगी।

- सरल शब्दों में, देश की हालत जितनी खराब रहेगी ,चाटुकारिताजीवी की हालत उतनी अच्छी रहेगी।


◆सेवाएं एवं शर्तें -

- चाटुकार संस्था को अन्य सभी संस्थाओं एवं विधानों से ऊपर मानना होगा।

- संस्था द्वारा निर्देशित कार्यों को अंजाम देते वक्त अपने दिमाग का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करना होगा।

- संस्था के नियमों से असहमत व्यक्ति/व्यक्तियों/ संगठन के खिलाफ आभासी दुनिया के विभिन्न मंचों पर बेखौफ दुष्प्रचार करना होगा। ज़रूरत पड़ने पर वास्तविक दुनिया में हथियारों के सहारे असहमति को दबाना होगा।

- समय - समय पर जी हुज़ूर बोलते रहना होगा।

- संस्था के विरोध में उठे स्वरों को दबाने के लिए उनसे ज़्यादा शोरगुल करना होगा।

- चरित्रहनन हेतु समय - समय पर संस्था द्वारा लक्ष्य दिया जाता रहेगा।

* चरित्रहनन करते वक़्त कुछ सावधानियां- 

- लक्षित व्यक्ति यदि स्त्री है तो उसके यौनांगों को लेकर निकृष्टतम शब्दों का प्रयोग करते हुए सार्वजनिक रूप से क्षत-विक्षत करने की धमकी देना।

- लक्षित व्यक्ति यदि पुरुष है तो उसके परिजनों माँ-बहन- बेटी को लेकर अश्लील शब्दों का भरपूर इस्तेमाल करना होगा, जान से मारने की धमकी देनी होगी।

- यदि लक्षित व्यक्ति दलित/आदिवासी/अल्पसंख्यक/बुद्धिजीवी है तो उसके घर जाकर हिंसा करनी होगी। उसे हमेशा के लिए भी चुप कराना पड़ सकता है।

◆ पदों की संख्या-

* 'पहले आओ पहले पाओ' के आधार पर यहां स्थान दिया जाएगा, क्योंकि दुनिया में चाटुकारों की कमी नहीं है।

     अतः जल्दी करें, कहीं देर न हो जाये।।


◆ पद का नाम - 'आंदोलनजीवी'

 ◆ पात्रता- 

  " जो घर फूंके आपना, चले हमारे साथ।"

◆ शैक्षणिक योग्यता- 

 " ढाई आखर की समझ होनी चाहिए।"

( पोथी पढ़ि- पढ़ि जग मुआ...)

◆ वांछनीय योग्यता-

- ज़मीर बेचकर अमीर बनने की ख्वाहिश न रखता हो।

- समाजहित के साथ अपना हित जोड़कर देखने की क्षमता रखता हो।

- बदलाव का स्वागत करने के लिए हमेशा तैयार हो।

- लाभ का पद पाने के लिए नहीं बल्कि लाभ का पद छोड़कर काम करने का हौसला हो।

- स्वाभिमानी हो।

◆ सेवाएं एवं शर्तें- 

" सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।।"

◆ वेतनमान एवं सुविधाएं- 

- आन्दोलनजीवी को कार्यस्थल पर पहुंचने से लेकर वहां रहने,खाने का खर्च स्वयं वहन करना होगा।

-  ज़रूरत पड़ने पर अन्य की भी आर्थिक मदद करनी होगी।

- पुलिस की लाठियां, आंसू गैस, चाटुकारिताजीवियों की गाली-गलौच की सुविधाएं मुफ्त में उपलब्ध होंगी।

- शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक रूप से प्रताड़ित किया जाता रहेगा।

◆ पदों की संख्या -

" हमसफर चाहिए, हुजूम नहीं,

इक मुसाफ़िर ही काफ़िला है मुझे।"


* आवेदक अपने रिस्क पर अप्लाई कर सकते हैं।।

        धन्यवाद..!!

शनिवार, 9 जनवरी 2021

दौर –ए- नक़ाब में बेनक़ाब क्या-क्या


दिलों में आग लबों पे गुलाब रखते हैं।

सब अपने चेहरे पे दोहरी नक़ाब रखते हैं।।

यहां सिर्फ व्यक्ति के चरित्र की बात नहीं हो रही है बल्कि इसमें समय, सत्ता और समाज के चरित्र को भी दर्शाया जा रहा है। दौर--नक़ाब यानी कोरोना काल में जब मास्क यानी मुखौटा या नक़ाब पहनना अनिवार्य कर दिया गया है तब लोगों को और सहूलियत हो गयी कि पहले से जो छिपाकर मुखौटे लगे थे उन पर खुलकर एक और मुखौटा लगाने की छूट मिली! इस मुखौटे वाले दौर में बहुत सारी हक़ीक़तें छिपाई गयीं तो बहुत सारे झूठ बेनक़ाब भी हुए। समय की परत चढ़ते जाने से हम बहुत सी बातों को विस्मृत कर देते हैं जोकि भुलाने के काबिल नहीं होती हैं । क्या इस दौर ने हमको जो सिखाया उसे इतनी जल्दी भूल जाना सही होगा? या उन गलतियों को दोबारा न दोहराया जाए इसके लिए भी प्रयास शुरू किए जाने चाहिए । हम इतिहास क्यों पढ़ते हैं? क्या सिर्फ डिग्री के लिए, जिससे जीविकोपार्जन का कोई साधन जुटाया जा सके अथवा सिर्फ ज्ञान के लिए । शायद इससे बढ़कर इतिहास हम इसलिए भी पढ़ते हैं ताकि हम इतिहास में की गई गलतियां दोहराने से बचें भी ।

      साल भर के घटनाक्रमों पर दृष्टिपात करें तो हम पाएंगे कि पूरी दुनिया के दम्भ को एक आंखों से न दिख सकने वाले विषाणु ने एक झटके में चकनाचूर कर दिया। इसके साथ ही हर एक सरकारी महकमें द्वारा किये जाने वाले दावों की भी पोल खोलकर रख दी। खैर, हमें नक़ाब से बात शुरू करनी थी और हम कहाँ भटकने लगे।

 

        वर्ष 2020 की शुरुआत ही नक़ाब के आतंक से होती हैजेएनयू की घटना (5 जनवरी,2020) को कौन भूल सकता है, जहां दर्जनों नकाबपोश लोग हाथ में हथियार लेकर घंटो परिसर के भीतर हिंसा का तांडव करते हैं और बाहर पुलिस और मीडिया मूकदर्शक बनी खड़ी रहती है। हैरानी की बात है कि ये सब हो रहा था देश की राजधानी में । देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में,जहां हमेशा से वैचारिक बहस को बढ़ावा दिया जाता रहा है, हिंसा को कभी स्वीकार नहीं किया गयाजहां असहमतियों का भी खुले दिल से स्वागत किया जाता रहा है दो अलग विचारधाराओं वाले व्यक्ति भी एक साथ एक टेबल पर बैठकर खाना खाते हुए घंटों एक दूसरे को अपने तर्कों से पटखनी देते हैं किंतु कभी भी हिंसा का सहारा नहीं लिया । इनका विश्वास है कि

पढ़े-लिखे हो तो, तलवार रख के बात करो

ज़बाँ वाले ज़बाँ को ज़बाँ से काटते हैं।।

सरकार और मीडिया ने तो इसे दो वैचारिक गुटों का झगड़ा बताकर अपना किनारा कर लिया किंतु नकाबपोश बेनक़ाब होते-होते रह गए..?

      वैसे साल 2020 बहुत से मायनों में बुरा रहा किंतु इस साल जो सबसे अधिक क्षतिग्रस्त हुआ वह था – ‘विश्वास’सबसे पहले धर्म और ईश्वर के प्रति सर्वाधिक सवाल खड़े किए गए, क्योंकि  पहले पहल सभी तरह के धार्मिक स्थलों को बंद किया गया। फिर पूंजीवाद द्वारा जीवन के जो मानक तय कर दिए गए थे,गाड़ी, बंगला, शॉपिंग मॉल, सिनेमाघर इत्यादि दिखावटी जीवन शैलियों को जीवन मूल्य बना दिया गया था, उसे एकाएक पलटकर रख दिया । सारी रंगीन चकाचौंध को सूरज की रोशनी में लाकर खड़ा कर दिया । सामाजिक स्तर पर लोग सामुदायिक कार्यक्रमों से कटकर घरों में कैद होकर रहने के लिए अभिशप्त हुए । लॉकडाउन में तो पूरी दुनिया ही अस्पताल के रूप में तब्दील हो गयी थी, जहां सिर्फ दवा की दुकानें ही खुली दिखीं (बाद में दारू की भी)। राजनैतिक स्तर पर असहमतियों को दबाया गया और लोकतंत्र को क्वारंटाइन कर दिया गया । सरकार ने लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया । कोरोना के बजाय भूख और लाचारी ने ही कितने लोगों की जान ली जो कि अत्यंत चिंताजनक है । मीडिया के प्रति तो पहले से ही अविश्वास कायम था उसको इस दौर की अधिकांश मीडिया ने और पुष्ट कर दिया । तीन महीने तक शेरलॉक होम्स बनकर सुशान्त मर्डर मिस्ट्री को सुलझाने के नाम पर लोगों को तीन माह तक उलझाए रखा।

     इससे इतर एक बड़ा प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि आखिर लोगों को अपने ही देश की मीडिया और सरकार या अपने ही समाज पर भरोसा क्यों नहीं होता? क्या कारण रहा है कि अनपढ़ तो छोड़ो पढ़े-लिखे लोग और नामी हस्तियां भी क्यों कोरोना संक्रमित होने के पश्चात बताने से कतराते रहे , ये विचारणीय प्रश्न है। ये हमारी शिक्षा, सरकार, मीडिया या व्यवस्था का दोष है या कि व्यक्तिगत कमजोरी, जो कि हमें जागरूक करने के बजाय भयाक्रांत करने में अधिक सफल हुए?  केवल व्यवस्था को दोषी बताकर क्या हम निकल सकते हैं? नहीं, कोरोना तो केवल एक चेतावनी थी, समस्याएं तो हमेशा रूप बदलकर देश-दुनिया के सामने आती रहेंगी । लेकिन हम कितने ‘मनुष्य’ बनकर यानी मानवीय रहकर इसका सामना कर पाते हैं, वही हमारी सभ्यता की प्रगति को दर्शायेगा ।

           अंततः व्यक्ति ,दल या सरकार किसी को भी बेहतर परिणाम के लिए अपने विचारों के क्रियान्यवयन से पूर्व इस केन्याई लोकोक्ति को ध्यान में रखना चाहिए कि ‘हमेशा अच्छा नाम छोड़कर जाएं , हो सकता है आप वापस आएं।’

शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

हवा में रहेगी मेरे ख़्याल की बिजली..

           

                                           

                           

इतिहास की ऐसी शख्सियत जिन्होने अपने अल्पकालिक जीवनावधि में दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ा है । भगत सिंह, एक ऐसा नाम जिसे सुनकर प्रत्येक युवा हृदय गर्व से फूल जाता है और एक अजीब सी ऊर्जा मन-मस्तिष्क में दौड़ने लगती है । आखिर उनके व्यक्तित्व में ऐसा क्या है जिसके कारण उन्हें लेफ़्टिस्ट, राइटिस्ट, सेंट्रलिस्ट, सोशलिस्ट, नेशनलिस्ट, किसान, मजदूर, विद्यार्थी, युवा और वृद्ध सभी सम्मान की दृष्टि से देखते हैं और उनकी तस्वीर को अपने दफ्तरों, कमरों, बैनरों, पोस्टरों आदि में स्थान देते हैं । मात्र 23 वर्ष की उम्र में समाज को लेकर एक मुकम्मल दृष्टि, परिपक्व राजनैतिक समझ और उद्देश्य व विचारों की स्पष्टता उन्हें अपने समकालीन बड़े नेताओं, बुद्धिजीवियों के समकक्ष और कुछ मामलों में आगे भी खड़ा कर देती है । इतनी कम उम्र में इतना कठोर और सधा हुआ निर्णय (जीवनोत्सर्ग) लेना जिससे वे अन्य शहीदों से भिन्न या उनका सम्मिलित प्रतीक बनकर शहीद-ए-आजम के रूप में पहचाने गए ।

     क्रांतिकारी किसी सम्मान, गौरव, पुरस्कार या इतिहास में जगह पाने की लालसा में नहीं लड़ते हैं । उनका संघर्ष किसी महान लक्ष्य के लिए होता है जो उच्च आदर्शों, मूल्यों से जुड़ा होता है। उस महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उनके व्यक्तित्व में भी उच्चादर्श समाहित होते हैं जिससे लोग सदियों तक प्रेरणा लेते रहते हैं । एक क्रांतिकारी कार्यकर्त्ता, संगठनकर्त्ता, चिंतक और लेखक के रूप में भगत सिंह ने जो भूमिका निभाई वही उन्हें भारतीय क्रांतिकारी चिंतन के प्रतीक के रूप में पहचान दिलाती है । उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं और विचारों से अवगत हुए बगैर उनकी असाधारण लोकप्रियता की पहचान कर पाना मुश्किल है ।

    भगत सिंह की जेल नोटबुक की टिप्पणियों के नाम देखकर आश्चर्य होना स्वाभाविक है क्योंकि इसमें मार्क्स, एंगेल्स, त्रोत्स्की, बर्टेंड रसेल, जान स्टुअर्ट मिल, जान लॉक , हर्बर्ट स्पेन्सर, स्पिनोजा, टॉमस एक्विनास, रूसो जैसे समाजचिंतक, दार्शनिक हैं तो गोर्की, मार्क ट्वेन, अप्टन सिंक्लेयर, विक्टर ह्यूगो, हेनरिक इबसन, टेनिसन और वर्ड्सवर्थ जैसे नाटककार, उपन्यासकर और कवि शामिल हैं । अपनी नोटबुक में भगत सिंह ने विभिन्न विषयों का अध्ययन करते हुए उसमें से महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ संगृहीत कीं जिसमें धर्म की सामाजिक भूमिका के पतनशील तत्वों पर सामाग्री जुटाई , परिवार, निजी संपत्ति और राजसत्ता की क्रांतिकारी आलोचना के दस्तावेज़ जुटाए । उन्होने धर्म और ईश्वर पर अपने विद्रोही विचार ही नही रखे बल्कि परिवार और विवाह संस्था को लेकर भी क्रांतिकारी विचार रखते हैं । भगत सिंह ने लिखा है कि मेरे दिमाग के हर कोने अंतरे से एक ही आवाज़ रह-रहकर उठती- अध्ययन करो । स्वयं को विरोधियों के तर्कों का सामना करने लायक बनाने के लिए अध्ययन करो । अपने मत के समर्थन में तर्कों से लैस होने के लिए अध्ययन करो । भगत सिंह कालकोठरी में रहते हुए जीवन के अंतिम क्षणों में भी विश्वचिंतन के इतिहास का अध्ययन कर रहे थे । इस अध्ययन और एकाग्र चिंतन ने उन्हें बेहद पारदर्शी विवेकसम्पन्न बना दिया । 

      आलोचना की दुनिया विचारों की दुनिया है और विचार के लिए बहस जरूरी है । बहस के जरिए एक पीढ़ी में जो सवाल पैदा होते हैं उनके जवाब अगली पीढ़ी को देने होते हैं भगत सिंह मानते थे कि आलोचना और स्वतंत्र विचार क्रांतिकारी के दो अनिवार्य गुण होते हैं और यह भी कि यथार्थवादी होने के लिए तो समूचे पुरातन विश्वास को ही चुनौती देनी होगी । भगत सिंह के चरित्र निर्माण व तर्क, विद्रोह और साहस की दीक्षा पारिवारिक वातावरण से ही प्राप्त होने लगी थी । इनके परिवारजनों ने जहां अपने सिख समुदाय की नाराजगी के बावजूद आर्यसमाज की गतिविधियां जारी रखी थीं वहीं खुद आर्यसमाज के राजनीति से दूर रहने की आम प्रवृत्ति को भी नकार दिया था । भगत सिंह किसी को भी आलोचना के क्षेत्र से बाहर नहीं रख सकते थे धर्म, ईश्वर, राजसत्ता या कोई भी बड़े से बड़ा नेता या कोई अन्य संस्था । उनकी जेल नोटबुक में एक उद्धरण मिलता है जो उल्लेखनीय है –

           "महान इसलिए महान है क्योंकि 

            हम घुटनों पर हैं 

           आओ उठ खड़े हों !"

बिना किसी पूर्वाग्रह के, तटस्थ होकर आलोचना का विवेक भगत सिंह के पास था । वे अगर मार्क्स, लेनिन और एंगेल्स को पढ़ते हैं तो त्रोटस्की को भी पढ़ते हैं और उनकी टिप्पणियों को भी अपनी डायरी में जगह देते हैं । 

                                      

     आज भी जब-तब हिन्दी को गैर-हिन्दी भाषी राज्यों पर थोपने की कोशिशें विभिन्न सरकारों द्वारा समय-समय पर की जाती रही है, ऐसे में हमें भगत सिंह के विचारों से इन्हें सीख लेनी चाहिए जो कि उन्होने मात्र सत्रह वर्ष की आयु में ‘पंजाबी की भाषा और लिपि की समस्या’ विषय पर अपने लेख में प्रकट किए – यह सब ठीक है, परंतु हमारे सामने इस समय सबसे प्रमुख प्रश्न भारत को एक राष्ट्र बनाना है । एक राष्ट्र बनाने के लिए एक भाषा का होना आवश्यक है, परंतु यह एकदम हो नहीं सकता । उसके लिए कदम-कदम चलना पड़ता है इसी लेख में साहित्य के संबंध में लिखते हैं कि “...साहित्य के बिना कोई देश अथवा जाति उन्नति नहीं कर सकती, परंतु साहित्य के लिए सबसे पहले भाषा की आवश्यकता होती है …” भगत सिंह को यह स्पष्ट था कि सामाजिक समस्याओं तथा परिस्थितियों के अनुसार यदि नवीन साहित्य की सृष्टि नहीं की जाएगी तो किसी भी महान कार्य अथवा विचार को स्थायी नहीं बनाया जा सकता ।  

     भगत सिंह जिस क्रांतिकारी संगठन से जुड़े थे उसका उद्देश्य केवल अंग्रेजों से हिंदुस्तान को आज़ाद कराना मात्र नहीं था । उनकी और उनके साथियों की दृष्टि अधिक व्यापक थी । भगत सिंह और उनके साथियों ने अगर असेंबली में बम फेंका तो किसी को आघात पहुँचाने के लिए नहीं बल्कि उसके पीछे एक पूरा ‘ दर्शन’ था । भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त चाहते तो बम फेंकने के बाद आसानी से भाग निकलते, मगर उन्होने जानबूझकर स्वयं को गिरफ्तार कराया क्योंकि वे क्रांतिकारी विचारों के प्रचार के लिए अदालत का एक मंच के रूप में उपयोग करना चाहते थे । यहाँ बम एक प्रतीक था ‘विचार’ का, और ‘धमाका’ विचारों के प्रसार का । विश्व भर के चिंतकों को पढ़ते हुए शोषकों की वास्तविक पहचान हो गयी थी इन लोगों को । उन्हें पता था कि पूंजीवादी राज्यों में मजदूर लोग एक मशीनी ताकत होते हैं और आम तौर पर अपने श्रम के सांस्कृतिक महत्व को नहीं पहचानते । हमारे मुल्क में ट्रस्टों, राष्ट्रीय शक्तियाँ लूटने वाले संगठनों, मेहनतकश जनता की कमाई पर जीने वाली जोंकों का बोलबाला है। आज़ादी और क्रांति से उनका आशय बहुत व्यापक था- 

आज़ादी का मतलब 

            भगत सिंह इस बात को बखूबी समझ रहे थे कि सत्ता का चरित्र हमेशा एक जैसा ही होता है, तभी उन्होने कह दिया था गोरे चले जाएंगे और भूरे हम पर राज करेंगे । आज़ादी को स्पष्ट करते हुए भगत सिंह ने कहा था कि हमारी आज़ादी का अर्थ केवल अङ्ग्रेज़ी चंगुल से छुटकारा पाने का नाम नहीं, वह पूर्ण स्वतन्त्रता का नाम है- जब लोग परस्पर घुल-मिलकर रहेंगे और दिमागी गुलामी से भी आज़ाद हो जाएंगे ।

क्रांति से आशय 

           भगत सिंह किसी हिंसात्मक क्रांति को बढ़ावा देने के पक्षधर नहीं थे । उनका मानना था कि क्रांति की तलवार विचारों की सान पर पैनी होती है और क्रांति ईश्वर विरोधी हो सकती है मगर मनुष्य विरोधी नहीं । वे इस बात को बखूबी समझते थे कि विचारहीन हिंसात्मक कार्यवाही से मात्र सत्ता का परिवर्तन हो सकता है, व्यवस्था का नहीं । क्रांति का आशय स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं कि क्रांति के लिए खूनी लड़ाइयाँ अनिवार्य नहीं हैं और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान है । वह बम और पिस्तौल का संप्रदाय नहीं है । क्रांति से हमारा अभिप्राय है – अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज-व्यवस्था में आमूल परिवर्तन । भगत सिंह कहते थे कि क्रांति मानवजाति का जन्मजात अधिकार है और उसका कोई अपहरण नहीं कर सकता ।

    सन् 1924 में मतवाला पत्रिका में ‘युवक’ नाम से भगत सिंह का एक लेख प्रकाशित हुआ। इसमें भगत सिंह युवावस्था को मानव जीवन का वसंत मानते हुए लिखते हैं चाहे तो त्यागी हो सकता है युवक, चाहे तो विलासी हो सकता है युवक । वह देवता बन सकता है तो पिशाच भी बन सकता है । वही संसार को त्रस्त कर सकता है, वही संसार को अभयदान दे सकता है । संसार में युवक का ही साम्राज्य है । युवक के कीर्तिमान से संसार का इतिहास भरा पड़ा है । जाहिर है कि युवक उत्साह और ऊर्जा का पुंज लिए जिस ओर बढ़ता है उधर ही रास्ता निकल आता है । साहित्य में युवावस्था को लेकर ऐसी ही भावाभिव्यक्ति ‘दिनकर’जी के यहाँ दिखती है –

      ‘संघर्षों के साये में इतिहास हमारा पलता है ।

      जिस ओर जवानी चलती है उस ओर ज़माना चलता है ॥

आखिर क्यों डरती हैं सत्ताएँ युवाओं से ?

     अब तक के इतिहास पर नज़र डालें तो हम पाते हैं कि देश में जब भी विपक्षशून्यता की स्थिति बनी है, सड़कें सूनी और संसद आवारा हुई है, तब-तब विद्यार्थी और युवा ही आखिरी उम्मीद के रूप में सामने नज़र आए हैं । देश का युवा खासकर विद्यार्थी वर्ग जिसके पास दिल-दिमाग, जोश और होश दोनों होता है । ये युवा, इन्हीं दोनों का संतुलन बनाकर किसी भी स्थापित सत्ता का संतुलन बिगाड़ने की हैसियत रखते हैं । आखिर विद्यार्थी के पास गोली-बंदूक नहीं होती फिर भी ये सत्ताएँ इनसे इतना भय क्यों खाती हैं ? क्योंकि, इनके पास विचारों की ताकत होती है । गोली-बंदूक से सिर्फ बदला लिया जा सकता है किन्तु विचारों से बदलाव लाया जा सकता है । इसी बदलाव से ही  तो डरती हैं सत्ताएँ । गोरख पांडे की कविता ‘उनका डर’ में इस भय को आसानी से देखा जा सकता है -

     वे डरते हैं

किस चीज़ से डरते हैं वे 

तमाम धन-दौलत 

गोला-बारूद पुलिस-फौज के बावजूद ?

वे डरते हैं 

कि एक दिन 

निहत्थे और गरीब लोग 

उनसे डरना 

बंद कर देंगे ।

      तत्कालीन राजनीति में राष्ट्रवाद के साथ-साथ साम्प्रदायिकता भी पनप रही थी जिस पर भगत सिंह की दृष्टि जाना स्वाभाविक था । महात्मा टालल्स्टोय की पुस्तक Essay and Letters का उद्धरण देते हुए भगत सिंह धर्म के तीन हिस्सों पर विचार किया –

1. Essentials of Religion, यानी धर्म की जरूरी बातें अर्थात सच बोलना, चोरी न करना , गरीबों की सहायता करना, प्यार से रहना इत्यादि । 

2. Philosophy of Religion, यानी जन्म-मृत्यु, पुनर्जन्म, संसार रचना आदि का दर्शन । 

3. Rituals of Religion, यानी रस्मों-रिवाज इत्यादि । 

          इसमें भगत सिंह ने यह पाया कि पहले हिस्से में सभी धर्म एक हैं जिसमें सच बोलने, चोरी न करने और प्रेम से रहने की बाते हैं । दूसरे हिस्से में भी दर्शन की बातों से भी कोई दिक्कत नहीं है बस तीसरे हिस्से यानी रस्मों-रिवाज से ही सारे भेद शुरू हो जाते हैं । इसलिए वे तीसरी और दूसरी बातों में अंधविश्वास के मेल से जो दिक्कत पैदा होती है उसके कारण धर्म को खारिज करने की बात करते हैं । साथ ही, पहली और दूसरी बात में स्वतंत्र विचारों के साथ यदि धर्म बनता है तो उसको स्वीकृति दे देते हैं । इसके साथ हिदायत भी देते हैं कि लेकिन अलग-अलग संगठन और खाने-पीने का भेदभाव मिटाना जरूरी है, छूत-अछूत शब्दों को जड़ से निकालना होगा । ये लेख 1928 में किरती में छपा था जबकि अंतिम क्षणों के अध्ययन में अपनी नोटबुक में उन्होने मार्क्स का प्रसिद्ध कथन नोट किया था कि धर्म मानवता के लिए एक अफीम है । इसके साथ ही बर्टेंड रसेल की धर्म आधारित टिप्पणी भी नोट कर रखी थी- धर्म के प्रति मेरा अपना दृष्टिकोण वही है जो लुक्रेटियस का है । मैं इसे भय से पैदा हुई एक बीमारी के रूप में, और मानव जाति के लिए एक अकथनीय दुख के रूप में मानता हूँ । निश्चित ही भगत सिंह का चिंतन समय के साथ अधिक गहन होता गया जिसका रेखांकन उनकी टिप्पणियों से होता है । उनका ये गहन चिंतन अंततः उन्हें नास्तिकता का ही विकल्प उपलब्ध कराता है । 

                                

      भगत सिंह नास्तिक होने के पीछे तर्क देते हैं कि मैं पूछता हूँ कि तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को उस समय क्यों नहीं रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है ? ये तो वह बहुत आसानी से कर सकता है ।… मैं आपको यह बता दूँ कि अंग्रेजों की हुकूमत यहाँ इसलिए नहीं है कि ईश्वर चाहता है, बल्कि इसलिए है कि उनके पास ताकत है और हममें उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं । भगत सिंह स्वयं को नास्तिक कहने लगे थे जिसके कारण उनके कई मित्र उन्हें अहंकारी भी कहने लगे थे । जिसके स्पष्टीकरण के तौर पर  उन्होने मैं नास्तिक क्यों हूँ’ जैसा विचारोत्तेजक लेख लिखा ।  

    इतिहास और साहित्य में गांधीवाद को जिस प्रकार स्थान दिया गया है क्या उसका दशांश भी भगत सिंह के विचारों को प्रसारित किया गया ? यहाँ गांधी जी की तुलना भगत सिंह से करने के पीछे किसी को कमतर या बेहतर साबित करने का उद्देश्य नहीं छिपा है बल्कि एक सामान्य प्रत्यभिज्ञान की कोशिश है कि क्या अहिंसा और त्याग को पूजने वाले भारतीय जनमानस को भगत सिंह एक हिंसा करने वाले आतंकी ही नज़र आते रहे हैं, जैसी छवि अंग्रेजों ने गढ़ी थी । भगत सिंह की निर्भीकता और निडरता के जितने किस्से (सांडर्स की हत्या और असेंबली में बम की घटना) भारतीयों तक पहुंचे क्या उनमें कहीं भी भगत सिंह के विचारों और सपनों की भी चर्चा मिलती है ? किसी भी समाजचिंतक या इतिहास को गति देने वाले का सही मूल्यांकन उसके सपनों के आधार पर किया जाना चाहिए ।  साहित्यकार व आलोचक मुद्राराक्षस लिखते हैं कि जहां भगत सिंह एक तार्किक आधुनिकतावादी थे, गांधी इतिहास को पीछे लौटाने वाले सनातनी हिन्दू थे । बहुत से लोग गांधी जी की तुलना जीसस से करते हैं । इस संबंध में मुद्राराक्षस जी का मत है कि जीसस की थोड़ी तुलना भगत सिंह से जरूर की जा सकती है । गांधी को धोखे से गोली मारी गयी थी । गांधी गोली से मरने का फैसला करके नहीं निकले थे जबकि भगत सिंह और जीसस दोनों ने ही जानबूझकर मृत्यु को बुलाया था ।  अछूत समस्या, सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज़, विद्यार्थी और राजनीति जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहुत ही गंभीर चिंतनपरक आलेख भगत सिंह की वैचारिक स्पष्टता और बेहतर भारत के उनके सपने को दर्शाता है । जहां समता, स्वतन्त्रता और बंधुत्व की स्पष्ट झलक दिख जाती है ।

      भगत सिंह की प्रगतिशील सोच केवल शोषक-शोषित, बुर्जुआ-सर्वहारा संघर्ष तक सीमित नहीं थी बल्कि स्त्री-पुरुष संबंध पर भी बेबाक टिप्पणी देते हैं, जिसका संकेत सुखदेव को लिखे एक खत में मिलता है – मैं कह सकता हूँ कि नौजवान युवक युवती आपस में प्यार कर सकते हैं और वे अपने प्यार के सहारे अपने आवेगों से ऊपर उठ सकते हैं । जिस समाज में भगत सिंह रह रहे थे उसमें किसी युवती को प्रेम करने की आज़ादी देना साधारण बात नहीं थी । भगत सिंह निजी संपत्ति, राज्य की उत्पत्ति और इनके बने रहने के लिए अनिवार्य परिवार और विवाह संस्था की सूूक्ष्मता से पड़ताल करते हैं । उनकी जेल नोटबुक में इससे संबन्धित कई महत्वपूर्ण उद्धरण मिल जाएंगे जो कि एंगेल्स को पढ़ते हुए उन्होने नोट किए थे । वर्ग-संघर्ष की शुरुआत के संबंध में एंगेल्स की यह टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है कि इतिहास में पहला वर्ग-विरोध एकविवाह प्रथा के अंतर्गत पुरुष और नारी के विरोध के विकास के साथ-साथ और इतिहास का पहला वर्ग-उत्पीड़न पुरुष द्वारा नारी के उत्पीड़न के साथ-साथ प्रकट होता है । 

          भारत भूमि की ये बिडंबना ही कही जाएगी कि जहां बुद्ध, कबीर आदि ने जिन बाह्याडम्बरों, मूर्तिपूजा आदि का खंडन किया, बाद में उनके अनुयायियों ने उन्हीं की मूर्ति बनाकर पूजना आरंभ कर दिया। इस व्यक्तिपूजक समाज में लोग किसी भी महामानव को देवता बनाकर पूजने के आदी हो चुके हैं। इससे उन्हें ये सहूलियत हो जाती है कि उनके विचारों और सिद्धांतों पर तर्क-वितर्क करने से छुटकारा मिल जाता है। फूल माला अर्पित करके कर्त्तव्यों से इतिश्री कर लेते हैं। शायद इसी को ध्यान में रखते हुए किसी ने कहा था कि चाहता हर कोई है कि भगत सिंह पैदा हों किंतु अपने नहीं पड़ोसी के घर में। हर वर्ष भगत सिंह की शहादत और जयंती हम मनाते हैं किन्तु कितने लोग उनके विचारों को पढ़ते हैं ? क्या ज़्यादातर युवा केवल सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीर चस्पाकर अथवा उनकी फोटो बनी टी-शर्ट पहनकर ही खुश नहीं हो लेते हैं ? भगत सिंह ने जिस अधूरे स्वप्न और सुनहरे भविष्य को दिल में बसाये हुए फांसी के फंदे को चूमा था क्या आज हम उस सपने को पूरा करने की कोशिश में भागीदार हैं ? आज भगत सिंह व्यक्ति नही विचार हैं और व्यक्ति को मारा जा सकता है किन्तु उसके विचारों को नहीं । इस बात को लेकर वे भी भली-भांति आश्वस्त थे, वरना अपने छोटे भाई कुलतार सिंह को लिखे ख़त में इस शे’र को अनायास ही जगह नहीं देते –

              हवा में रहेगी मेरे ख़्याल की बिजली । 

              ये मुश्ते - खाक़ है फानी,  रहे न रहे ।। 




सहायक ग्रंथ–

1. पंकज बिष्ट (सं), समयांतर (पत्रिका), वर्ष-50, अंक-3, दिसंबर 2018, पृष्ठ सं- 47

2. चमन लाल (संक. एवं संपा.), भगत सिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज़, आधार प्रकाशन, हरियाणा, सं-2018, पृष्ठ सं – 389

3. वही, पृष्ठ सं- 43

4. वही, पृष्ठ सं- 42

5. विपिन चन्द्र, आधुनिक भारत का इतिहास, ओरियंट ब्लैकस्वान, तेलंगाना, 2019, पृष्ठ सं-299

6. मैक्सिम गोर्की, संस्कृति के महारथियों आप किसके साथ हैं (लेख),बुद्धिजीवी का दायित्व (संकलन),गार्गी प्रकाशन, दिल्ली, जनवरी 2018, पृष्ठ सं- 85

7. चमन लाल (संक. एवं संपा.), भगत सिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज़, आधार प्रकाशन, हरियाणा, सं-2018, पृष्ठ सं – 151

8. वही, पृष्ठ सं- 185

9. वही, पृष्ठ सं- 178

10. कविता कोश – 'गोरख पांडे'

11. चमन लाल (संक. एवं संपा.), भगत सिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज़, आधार प्रकाशन, हरियाणा, सं-2018, पृष्ठ सं – 151

12. वही, पृष्ठ सं- 462

13. वही, पृष्ठ सं- 364

14. वही, पृष्ठ सं- 262

15. मुद्रराक्षस, भगत सिंह होने का मतलब, साहित्य उपक्रम, दिल्ली, दिसम्बर 2010, पृष्ठ सं- 14

16. वही पृष्ठ सं- 15

17. चमन लाल (संक. एवं संपा.), भगत सिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज़, आधार प्रकाशन, हरियाणा, सं-2018, पृष्ठ सं – 178

18. एंगेल्स, परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति, पी.पी.एच,न्यू दिल्ली,2010, पृष्ठ सं- 79

19. चमन लाल (संक. एवं संपा.), भगत सिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज़, आधार प्रकाशन, हरियाणा, सं-2018, पृष्ठ सं – 238